Shaheen Bagh में दीपक चौरसीया की फर्जी रिपोर्टिंग, आखिर क्यो भड़की जनता, ...पढ़े आंखो देखा हाल, ..देखें सबूत के फ़ोटो

"फासीवादी आतंकी समूहों के लिए पैसा ले कर काम करने वाले "गोदी पत्रकारों" या "गोदी मीडिया" की फर्जी रिपोर्टिंग का आंखो देखा हाल ---- ज़रीन हलीम की ज़ुबानी"

आप फ़ोटो में ख़ुद ही देखिए कि यह महाशय कितने ख़ुश और पुरसुकून हैं।

नई दिल्ली, Nit: 
जी हां 24th January को शाम के समय तकरीबन चार बजे के आसपास यह एनाउंस हुआ कि दीपक चौरसिया आ गए हैं और वह आप लोगों की बात सुनेंगे । उस समय मैं मंच पर जा रही थी लोगों को अपनी कविता सुनाने जो शाहीन बाग़ की जांबाज़ औरतों को समर्पित थी।जब मैं मंच से नीचे आई तो देखा दीपक चौरसिया अपने चार पांच आदमियों के साथ वहीं टहल रहे थे और हंस-हंस कर मुआइना करने में व्यस्त थे ।मेरे साथ मेरी दोस्त भी मौजूद थीं और सीनियर जर्नलिस्ट भाषा सिंह अपनी मां शोभा सिंह जोकि एक अच्छी लेखिका हैं के साथ वहीं थीं।शोभा दीदी को भी अपनी बात आंदोलन कारियों के सामने रखनी थी अतः वह मंच पर चली गईं।हम दोनों यानी मेरे साथ मेरी दोस्त जिन्हें दीपक चौरसिया से मिलना था हम उनके पास गए और फोटो भी खिंचवाई।जोकि बतौर सबूत है मेरे पास। इसी तरह से क़रीब आधा घंटा निकल गया।तभी मैंने देखा दीपक चौरसिया के साथ आए लड़कों ने अपने अपने मोबाइल से कैमरा सेट कर लिया और कैमरामैन के साथ उनकी टीम इंटरव्यू के लिए औरतों के बीच में घुस गई।तबतक सभी ने उनका सम्मान किया और मदद भी की। परंतु ऐसा क्या हुआ कि अचानक लोग ख़िलाफ़ हो गए? वह भीड़ जो इतनी शांति से सभी को मौक़ा दे रही थी इंटरव्यू लेने का और खुद भी अपने आंदोलन को खामोशी से चला रही थी वह भी पिछले अड़तीस दिनों से वह क्यो किसी पर हमला करेंगी। 

दीपक चौरसिया के लोगों ने पहला प्रश्र ही आपत्तिजनक और अपमानजनक पूछा कि वह वहां वह कितने पैसों मे बैठी हैं (जैसा कि वहां पर खड़े लोगों ने उसी समय बताया और उन लोगों के हावभाव से भी यही लगा) इससे पहले वह अपना आने का और आंदोलन की कवरेज का मक़सद भी नहीं बता पाए जिसने पहले ही लोगों को शंकित कर दिया था । और सोने मे सुहागा उनकी इमेज थी मोदी भक्त की जो पिछले एक हफ्ते से और भी मज़बूत हो गई थी जहां वह रोज़ इस आंदोलन के ख़िलाफ़ डिबेट करने में लगे थे ।फिर भी वहां के लोगों ने बड़ा दिल दिखाते हुए इन्हें उपस्थित होने दिया जोकि यह साबित करती है कि वहां के लोगों का कितना विशाल हृदय है।परंतु आप उन्हीं की औरतों को यदि बदनाम करने की नीयत से आए हैं तो आपको भागना ही पड़ेगा।मेरे सामने उनके पहले सवाल ने सबको बेचैन कर दिया और लोगों की खिलाफत के बावजूद भी वह तस्वीरें ले रहे थे और उनके आदमी अपने कैमरों से मनमानी पहलू को कवर करते हुएअपने हिसाब से फोटो ले रहे थे।ऐसा लग रहा था कि यह आए ही इसी मकसद से थेकि इनको उत्तेजित कर फिर यह सिद्ध कर दें कि सभी आतंकी हैं। परंतु मेरे सामने ही उन्हें सही सलामत सुरक्षित वहां से निकलने में लोगों ने बहुत मदद की।मेरे सामने सब एक एक करके चले गए बिना एक खरोंच आए।

शाम को जब घर पहुंच कर टी वी आन किया तो दीपक चौरसिया महाशय ने पूरी कहानी अपने हिसाब से बदलकर रख दी थी ।वह चीख़ चीख़ कर अपनी चोटों का जिक्र कर रहे थे । उन्होंने तो यहां तक कह दिया कि लोगों की मंशा उन्हें बंधक बनाने की थी??। उनके वह सारे लोग जो वहां आए थे टी वी पर चीख पुकार मचाए हुए थे।मेरी हैरानी की कोई सीमा ना रही। कहानी कैसे अपने हिसाब से रची और प्रस्तुत की जाती है पहली बार देखा।


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