Delhi Violence Story 14: क्या दिल्ली के दंगे पेशेवरों का काम थे?, बीते तीन दिन में 20 ट्रकों से ज्यादा ईंट-पत्थर हटाए गए


नई दिल्ली, Nit. :

‘एक वहशी भीड़ दोनों तरफ से आई. पहचाने हुए लोग नहीं थे. सब बाहर के लोग थे.’
बीते 25 साल से उत्तर-पूर्वी दिल्ली के मुस्तफाबाद इलाके में रह रहे दीन मोहम्मद मंसूरपूरी एक समाचार चैनल से बातचीत में यह कहते हैं. उनका एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर चर्चित हो रहा है जिसमें शोरगुल करती एक भीड़ के बीच वे लोगों से शांति की अपील करते नजर आ रहे हैं. यह अलग बात है कि दीन मोहम्मद की किसी ने सुनी नहीं.
कमोबेश दीन मोहम्मद जैसी ही बात पास के करावलनगर में रहने वाले मुकेश जाटव बताते हैं. वे कहते हैं, ‘बहुत सारे लोग थे. मुंह पे डाटे (कपड़े) बांध के आए थे. हमने रोकने की खूब कोशिश की. वो बोले कि तुम्हें भी मार देंगे. तो क्या करते! चुप हो गए.’
इंटरनेट और सोशल मीडिया पर दिल्ली में बीते हफ्ते हुई हिंसा से जुड़े जिन वीडियोज की भरमार है उनमें कई और भी लोग कुछ ऐसा ही कहते दिखते हैं. दिल्ली के उत्तर-पूर्वी इलाकों में हुई इस हिंसा में मरने वालों का आंकड़ा अब तक 45 हो चुका है. 200 से ज्यादा लोग घायल हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भारत यात्रा के दौरान लगी इस आग की पूरी दुनिया में चर्चा है. इसके साथ ही यह सवाल भी उठ रहा है कि ऐसे वक्त में, जब दुनिया के सबसे ताकतवर मुल्क का मुखिया देश की राजधानी में था, इतने बड़े पैमाने पर हिंसा कैसे संभव हुई.
इसका संभावित जवाब उन तमाम जानकारियों में खोजा जा सकता है जो अब सामने आ रही हैं. इन जानकारियों से बनने वाली अलग-अलग कड़ियों को जोड़ा जाए तो ऐसा लगता है कि यह हिंसा एक सुनियोजित साजिश के साथ हुई और इसे निहायत पेशेवराना तरीके से अंजाम दिया गया.
दिल्ली का शिव विहार इलाका उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद की सीमा से सटा है. फिलहाल यह गृहयुद्ध से बर्बाद हो चुके सीरिया के किसी कस्बे सा लगता है. इसी शिव विहार में राजधानी पब्लिक स्कूल है जो आगजनी में तबाह हो चुका है. पुलिस की जांच टीम जब यहां पहुंची तो उसे छत पर पेट्रोल बमों और ईंट-पत्थरों के अलावा दो विशाल गुलेलें मिलीं. इन गुलेलों को छत की मुंडेर पर विशेष तरीके से फिट किया गया था.
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जांच अधिकारियों के मुताबिक इन गुलेलों का इस्तेमाल लॉन्चर की तरह किया गया. उपद्रवियों ने इनकी मदद से दूर-दूर तक पेट्रोल बम फेंके जिनकी वजह से बड़े पैमाने पर आगजनी संभव हो सकी. एक अखबार से बातचीत में स्कूल के गार्ड मनोज का कहना था कि करीब 150 उपद्रवी 24 फरवरी की शाम से देर रात तक पांचवीं मंजिल पर स्थित इस छत से पेट्रोल बम फेंकते रहे. नतीजतन कई मकान, दुकान और 100 से ज्यादा कारें खाक हो गईं.
हिंसा प्रभावित कई इलाकों में ऐसी गुलेलें पाई गई हैं. और ये गुलेलें सिर्फ छतों पर ही नहीं मिलीं. कई हाथ रिक्शा भी मिले जिनमें इस तरह की गुलेलें लगा दी गई थीं. जांच अधिकारियों के मुताबिक चलती-फिरती इन गुलेलों को योजना के साथ इधर-उधर ले जाया जा रहा था. पेट्रोल बमों के साथ इनसे एसिड भरे पाउच और ईंट-पत्थर भी फेंके गए.
ईंट-पत्थरों का चकरा देने वाली हद तक इस्तेमाल इस हिंसा का एक और ध्यान खींचने वाला पहलू है. जिस तरह की तस्वीरें हिंसा से प्रभावित इलाकों से आ रही हैं उन्हें देखकर लगता है मानों यहां ईंट-पत्थरों की बारिश हुई हो. एमसीडी ने अकेले शिव विहार से बीते तीन दिन में 20 ट्रकों से ज्यादा ईंट-पत्थर हटाए हैं. कई जगहों पर ईंट-पत्थरों के टुकड़ों को देखने से साफ पता चलता है कि उन्हें विशेष तरीके से तोड़ा गया है ताकि उनके सिरे नुकीले रहें जिससे ज्यादा से ज्यादा चोट पहुंचे. जांच अधिकारियों के मुताबिक इतने बड़े पैमाने पर ईंट-पत्थर जमा करने में कई दिन लगे होंगे.
लेकिन दिल्ली में हुई हिंसा का सबसे चिंताजनक पक्ष है बड़े पैमाने पर हुई गोलीबारी. अधिकारियों के मुताबिक यह पहली बार है जब किसी दंगे में उपद्रवियों ने इतनी ज्यादा गोलीबारी की हो. बताया जा रहा है कि भजनपुरा से सटे चांदबाग इलाके में ही दो दिन में करीब पांच हजार राउंड गोलीबारी हुई है. मरने वालों में से आधे से ज्यादा को गोलियां ही लगी हैं और उनकी पोस्टमार्टम रिपोर्ट से संकेत मिलते हैं कि ये गोलियां देसी कट्टों से चलाई गई थीं. कट्टे से कई यानी मल्टीपल राउंड फायर नहीं किए जा सकते इसलिए संभावना जताई जा रही है कि हिंसा में सैकड़ों कट्टों का इस्तेमाल हुआ होगा.
यहीं इस हिंसा का एक सिरा कई वाट्सएप ग्रुप्स से भी जुड़ता है. पुलिस के मुताबिक इन ग्रुप्स की मदद से ही उपद्रवी बता रहे थे कि उनके पास कितने हथियार बचे हैं और दूसरी तरफ से उन्हें बताया जा रहा था कि उन्हें और हथियार किस जगह पर मिलेंगे. अब इन वाट्सएप ग्रुप्स की भी पड़ताल की जा रही है.
इस पैमाने पर हुई हिंसा और इसमें हथियारों के इस्तेमाल ने शक की सुई आपराधिक गैंगों की तरफ भी मोड़ी है. पुलिस सूत्रों के हवाले से चल रही कई खबरों में कहा जा रहा है कि हिंसा में छेनू पहलवान गैंग और नासिर गैंग भी शामिल थे. एक-दूसके के कट्टर विरोधी ये दोनों ही गैंग दिल्ली और गाजियाबाद की सीमा के आसपास सक्रिय हैं और पिछले काफी समय से पुलिस के लिए सिरदर्द बने हुए हैं. खबरों के मुताबिक इस संभावना की भी जांच की जा रही है कि क्या किसी ने पैसे देकर इन गैंग्स की सेवाएं ली थीं.
करावल नगर निवासी अमित श्रीवास्तव (बदला हुआ नाम) कहते हैं, ‘हमें यहां रहते हुए लंबा अरसा हो गया. लेकिन जिन लोगों को हमने हिंसा करते हुए देखा उन्हें न तो मैं पहचानता था न मेरा कोई दोस्त. वे मिनटों में दुकानों के शटर ऐसे तोड़ रहे थे जैसे यही काम करते रहे हों.’ वे भी मानते हैं कि हिंसा करने वाली भीड़ पेशेवर अपराधियों की थी.
लेकिन क्या इसमें स्थानीय लोग बिल्कुल भी शामिल नहीं थे, यह पूछने पर वे कहते हैं, ‘कुछ तो रहे ही होंगे वर्ना चुन-चुनकर संपत्तियों को निशाना कैसे बनाया जाता. फिर भी मैं कहूंगा कि बड़ी संख्या बाहर वालों की ही थी.’ करावल नगर में रहने वाले मुकेश जाटव भी कहते हैं, ‘हम लोग तो डर के मारे घरों में दुबके हुए थे.’
उत्तर-पूर्वी दिल्ली भाजपा के अल्पसंख्यक मोर्चे के उपाध्यक्ष अख्तर रजा का भी दावा है कि दंगाइयों में बाहर के लोगों की बड़ी संख्या थी. एक चैनल से बातचीत में उनका कहना था, ‘बाहर के लोग उनके (स्थानीय लोगों) साथ हैं. आइडेंटीफाइ वो करवा रहे हैं, आग दूसरे लगा रहे हैं.’ हिंसा के दौरान अख्तर रजा का घर भी फूंक दिया गया.
फिलहाल, उत्तर पूर्वी दिल्ली में हुई हिंसा के सिलसिले में दिल्ली पुलिस ने अब तक 254 एफआईआर दर्ज की हैं. 903 लोगों को गिरफ्तार किया गया है या हिरासत में लिया गया है. दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता एमएस रंधावा का कहना है कि स्थिति अब सामान्य है. लेकिन यह तय है कि इस हिंसा ने जिन्हें सबसे ज्यादा चोट दी है उनके लिए स्थिति सामान्य होने में अभी लंबा वक्त लगना है.
(सत्याग्रह)
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