फ़सल कटाई पर लॉकडाउन! किसान भूख से मरे या करोना से! - Cover story

 

नई दिल्ली, Nit. :

कोरोना के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये सरकार ने लॉक डाउन घोषित किया था. इसकी घोषणा ऐसे समय की गई जब पूरे देश में फसलों की कटाई का सीजन चल रहा था. ऐसे में किसान के लिये घर बैठना संभव नहीं था.

महोबा के गांव पराखेरा के अच्छेलाल ने हर साल की तरह इस बार भी अपने खेत में गेहूं और मसूर की फसल बोई थी. इस बार फसल अच्छी होने से उम्मीद थी कि मुनाफा ज्यादा होगा. अब हालात ये हैं कि साल भर की जरूरत का अनाज भी मिल पाएगा, कहना मुश्किल है. वे बताते हैं कि आधे से ज्यादा फसलें बारिश की वजह से खराब हो गईं और बची-खुची को इस बंदी ने लील लिया! ज़्यादातर किसानों का यही हाल है।

बेमौसम बरसात और कोरोना की वजह से हुई बंदी ने देश भर के किसानों के सामने एक बड़ी मुसीबत खड़ी कर दी है. उन्हें समझ नहीं आ रहा कि वे कोरोना से बचाव करें या फिर अपनी फसलें काटें. कोरोना से बच गये तो साल भर खाएंगे क्या, इसकी चिंता सता रही है.दूसरी ओर, कोरोना से बचाव नहीं करते हैं, फिर तो सब लोभ-लाभ यहीं धरा रह जाएगा.

कोरोना के बढ़ते प्रभाव को रोकने के लिये सरकार ने लॉक डाउन घोषित किया था. इसकी घोषणा ऐसे समय की गई जब पूरे देश में फसलों की कटाई का सीजन चल रहा था. ऐसे में किसान के लिये घर बैठना संभव नहीं था.

पराखेरा गांव के ही किसान सौरभ कहते हैं, “कोरोना की वजह से हुई बंदी ने बहुत नुकसान किया है. खेत में बोई जाने वाली फसल में हर चीज का एक तय समय होता है। इसमें दो-तीन दिन की देरी-जल्दी तो चल सकती है, लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि सिंचाई के समय कटाई और बुआई के समय सिंचाई हो. यह समय फसलों की कटाई का है. आज कटने वाली फसल को 10 दिन बाद काटेंगे, तो इससे कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि फसल के दाने खेत में गिर चुके होंगे.”

लॉक डाउन के समय में सरकार ने कुछ जरूरी चीजों की आपूर्ति के लिये लॉक डाउन पास निर्गत किये हैं. कृषि कार्य के लिये किसान भी पास बनवाकर अपना काम कर सकते हैं। इस तरह राज्य सरकारों ने कुछ प्रावधानों के साथ किसानों को कृषि कार्य की छूट प्रदान की है. किसानों को दी गई छूट में कटाई के लिये कम से कम मजदूरों का प्रयोग और सोशल डिस्टेंस की ज़रूरी शर्तें लगाई गई हैं. ऐसी शर्तों के साथ किसानों को छूट देने वाले राज्यों में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश,पंजाब प्रमुख हैं.

सौरभ आगे बताते हैं, “खेतों में जाने पर पुलिस रोकती है. पुलिस वाले पास दिखाने को कहते हैं. पास न दिखा पाने वालों को पुलिस मारने लगती है. वे बताते हैं कि कटाई का सीजन जोरों पर है, पर मजदूरों की किल्लत है. ऊपर से पुलिस की दिक्कत. कुछ पुलिस के डर की वजह से घर से नहीं निकल रहे और कुछ कोरोना के डर से, ऐसे में काम हो तो कैसे? जो लोग खुद कटाई में लगे हैं, वे पास बनवाने के लिये लाइन में लगें या कटाई करें?”

बांदा शहर में रहते हुए गांव की किसानी संभालने वाले कल्लू बताते हैं, “मेरी मटर और मसूर की पूरी फसल अभी तक खेतों में कटी पड़ी है. जहां हम रहते हैं, गांव वहां से 30 किमी की दूरी पर है. खेती के समय रोज आना-जाना होता था, लेकिन लॉक डाउन की वजह से पुलिस वाले जाने ही नहीं दे रहे. कहते हैं कि पास लेकर आओ. अब आप ही बताइये, पास बनवाने के लिये लाईन में लगूं या फिर फसल कटवाऊं?”

महोबा जिले के किसान हरगोविंद बताते हैं, “लॉक डाउन के बाद एक दिन जब खेत की तरफ जा रहे थे, तब पुलिस वाले आए और दो-तीन थप्पड़ मार कर घर भेज दिया. उस दिन के बाद से फसल खेत में पड़ी हुई है.” दोबारा काटने क्यों नहीं गये, इस सवाल पर वे कहते हैं कि पुलिस वाले रोक लेते हैं.

मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले के किसान सुरेन्द्र बताते हैं, “यह बात सही है कि सरकार ने किसानों को कृषि कार्य के लिये छूट दी है, लेकिन कागजों और सरकारी आदेशों में लिखा होना अलग बात है और जमीन पर लागू होना अलग बात. किसी दूसरे का क्या बताऊं? उनके मेंरे खेतों की फसलें ज्यों की त्यों तैयार खड़ी हैं. लेकिन काटने की परमिशन नहीं मिली.” वे लाचारी से कहते हैं कि अगर जल्दी ही परमिशन का जुगाड़ हो गया तो ठीक है, वरना फ़सलों को बेकार होते देखने के सिवाय हमारे पास और कोई चारा नहीं है.

अचानक हुए लॉक डाउन की वजह से किसान ही नहीं, खेत-मजदूरों की हालत खस्ता है. खेत-मजदूर के तौर पर काम करने वाले छिकौड़ी बताते हैं, “यही एक महीने का समय होता है, जब हम दूसरों के खेत में काम करके कुछ मजदूरी और साल भर खाने के लिये गेहूं,चना, मटर का जुगाड़ कर लेते है, लेकिन इस बार बंदी की वजह से काम नहीं कर पाये.” मजदूरों को तो खेती-किसानी के काम करने की छूट है, यह बताने पर वे कहते हैं- “हाथी के दांत दिखाने के कुछ और खाने के कुछ और होते हैं. यहां भी वही हाल है. छोटे किसानों के यहां काम नहीं मिलता है और बड़े किसान पुलिस के डर से ज्यादा मजदूरों को काम पर नहीं लगा पा रहे, भले ही चार दिन का काम एक हफ्ते में हो रहा हो. गलती उनकी भी नहीं है, क्योंकि सरकारी आदेश है. नहीं मानते हैं, तो पुलिस का डर. ऐसे में कोई क्या ही कर सकता है.”

हमीरपुर के गंगा प्रसाद बताते हैं, “यहां के मजदूरों की हालत पहले से ही बहुत खराब है, जिसके लिए मध्य प्रदेश के कई इलाकों से आने वाले मजदूर जिम्मेदार हैं. ये यहां हर सीजन में काम की तलाश में आते है. बाहर से जो मजदूर आते हैं, वे यहां के मजदूरों से थोड़े कम दाम पर काम करके ज्यादा से ज्यादा काम हथिया लेते हैं. इससे बड़े किसानों को तो सहूलियत हो जाती है, लेकिन हम लोगों के लिये मुसीबत खड़ी हो जाती है. रही-सही कसर इस कोरोना ने पूरी कर दी है. पहले जो थोड़ा-बहुत काम मिलता था, इस बार वो भी नहीं मिल रहा है.”

मौदहा के किसान हरिश्चंद बताते हैं, “लॉक डाउन की वजह से फसल काटने की ही दिक्कत नहीं है. दरअसल ज्यादातर किसान फसल काटने के बाद सीधे मंडी ले जाते हैं. ऐसा वे यह सोचकर करते हैं कि अगर फसल को शुरुआती समय में बेच दिया जाए, तो अच्छे दाम मिलने की गुंजाइश होती है और दो-तीन बार लदाई-ढुलाई से भी बच जाते हैं. इस बार लॉक डाउन की वजह से ऐसा कर पाना संभव नहीं है. अब मजबूरन फसल को घर लाना पड़ेगा.”

‘मंडी तो खुली हैं’- यह बताने पर वे कहते हैं-“हां, लेकिन वहां व्यापारी ही नहीं हैं और अगर व्यापारी हैं, तो पल्लेदार नहीं है. वहां ले जाने पर खतरा है कि न जाने कितने दिन वहां खड़ा रहना पड़ जाए. हर किसान के पास निजी वाहन तो है नहीं कि वो हफ्ते-दस दिन वहां खड़ा रहे। भाड़े से माल ढुलाई करेंगे, तो साल भर की जो कमाई है, वो भाड़े वाला ले जाएगा.”

मध्य प्रदेश के अलग-अलग जिलों से आए करीब 150 मजदूर उत्तर प्रदेश के बुन्देलखंड इलाके में फंसे हुए हैं. इन्हीं में से एक शिवपुरी के जीवनराम ने बताया, “हम लोग पूरे साल के दौरान कोई तय काम नहीं करते, बल्कि सीजन के हिसाब से अलग-अलग काम करते हैं. उसी में ये खेत कटाई भी शामिल है, हम लोग साल में दो बार बुवाई और कटाई के समय इस तरफ आते हैं. ऐसा करने से हम कम समय में ज्यादा पैसे कमा लेते हैं. इस बार बहुत बड़ी गलती कर दी है. 10 दिन से यहां हैं, लेकिन एक पैसे का काम नहीं हुआ. घर से इतनी दूर बिना किसी सहारे के यहां पड़े हुए हैं और अपनी जेब का खा रहे हैं. डर लगा हुआ है कि बाहरी के नाम पर न जाने किस दिन पुलिस पकड़ ले जाए और बंद कर दे.”

घर क्यों नहीं लौटे? इस सवाल के जवाब पर वे कहते हैं कि लौटने का मौका ही नहीं मिला.

 


 

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