Cover Story : नेता-पुलिस-अपराधी गठजोड़ से क्यों नहीं होती मुठभेड़ ?

"अब हमें तन्त्र की खामियों को दूर करने के ठोस उपाय करने होंगे। भागते हुए विकास दुबे पर 20 साल पहले इसी पुलिस ने उस वक्त गोली नहीं चलाई थी जब उसने थाने के भीतर मंत्री को मारा था। यही सिपाही कोर्ट में गवाही से मुकर गए थे। इसलिए सवालों के भवरजाल से आगे समाधान की तरफ आना होगा। 8 पुलिस वालों की हत्या का मामला पुलिस-नेता और कारोबारी गठजोड़ का नंंगा उदाहरण है। विकास से जिंदा रहते सच उगलवा लिया गया होता तो तमाम चेहरे बेनकाब हो जाते। पुलिस भी और निचले स्तर की न्याय पालिका भी। नेता तो नग्न खड़े दिख ही रहे हैं। अब निष्पक्ष और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच जरूरी हो गई है।"


ब्रजेंद्र प्रताप सिंह(वरिष्ठ पत्रकार), लखनऊ, Nit. :

डीएसपी समेत 8 पुलिस वालों का हत्यारा कुख्यात विकास दुबे उज्जैन से जिंदा आया पर कानपुर शहर के मुहाने पर वह मुठभेड़ का ‘शिकार’ हो गया। एमपी पुलिस ने उसे यूपी पुलिस को सौंप दिया था और उसे कानपुर लाया जा रहा था। पुलिस का बयान है कि रास्ते में कार पलटने पर विकास दुबे भागा। उसने गोली चलाई और जवाबी गोली में वो मारा गया। यह मुठभेड़ सवालों से घिर गई है। पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने फ़ौरन कहा कि कार पलटने के कारण ‘सरकार पलटने’ से बच गई। सत्ता पक्ष भी अखिलेश पर हमलावर है। सावन की फुहारों के बीच सियासत धधक रही है।

विकास दुबे की मौत के बाद दो तरह के विचारों से सोशल साइट्स भर गई हैं। एक कि विकास के साथ ठीक हुआ। ये विचार जाहिर करने वाले न्यायपालिका पर खीझ  मिटाते हुए कहते हैं कि विकास जैसे लोग कोर्ट से छूट जाते हैं। दूसरे विचारक उसकी इस तरह की मौत के खिलाफ है मगर उसे फांसी पर चढ़ते हुए देखना चाहते थे। विकास व उसके गुर्गों की मौत, और डीएसपी समेत 8 पुलिस वालों की शहादत कुछ सवाल खड़े कर गई है। कुछ सच सामने लाई है। हमें गम्भीरता और ईमानदारी से जवाब खोजने होंगे; आगे बढ़ना होगा। विकास दुबे के एनकाउंटर पर सैकड़ों सवाल उठे हैं और जाहिर कुछ लोग अदालत भी जाएंगे।

सवाल इस बात पर भी है विकास को गिरफ्तार करने के बाद मध्य प्रदेश पुलिस ने उससे पूछताछ से ज्यादा दिलचस्पी उसे यूपी पुलिस को सौंपने में क्यों दिखाई? रात में ही उसे उज्जैन से लेकर कानपुर के लिए चली यूपी पुलिस का इकबाल 8 साथियों के मारे जाने के कारण बुरी तरह गिरा हुआ था। पुलिस ने जब उसके घर पर बुलडोजर चलाया था; तभी उसकी खिसियाहट दिखी थी। पुलिस को भी ‘रूल आफ लॉ’ पर भरोसा नहीं था क्या? दरअसल भरोसा होने से ज्यादा जरूरी है कि भरोसे का प्रदर्शन। यूपी पुलिस अक्सर यहीं पर चूक जाती है। ज्यादातर प्रदेशों की पुलिस ऐसा ही करती है और उसका जवाब भी लाजवाब होता है। जनता कभी रेपिस्ट को मार गिराने वाली तेलङ्गाना पुलिस का फूल बरसाकर स्वागत करती है और कभी आंध्र प्रदेश के थाने में मार दिये गए बाप-बेटे की मौत के खिलाफ पुलिस के खिलाफ सड़क पर आती है। यह उसके भाव हैं। हमें जन भावना को समझना होगा कि वह न्याय चाहती है। न्याय किसी अपराधी को मार गिराना नहीं है; विधि से स्थापित तरीके से अपराधी को फांसी के फंदे तक ले जाना ही न्याय है।

अब हमें तन्त्र की खामियों को दूर करने के ठोस उपाय करने होंगे। भागते हुए विकास दुबे पर 20 साल पहले इसी पुलिस ने उस वक्त गोली नहीं चलाई थी जब उसने थाने के भीतर मंत्री को मारा था। यही सिपाही कोर्ट में गवाही से मुकर गए थे। इसलिए सवालों के भवरजाल से आगे समाधान की तरफ आना होगा।

8 पुलिस वालों की हत्या का मामला पुलिस-नेता और कारोबारी गठजोड़ का नंंगा उदाहरण है। विकास से जिंदा रहते सच उगलवा लिया गया होता तो तमाम चेहरे बेनकाब हो जाते। पुलिस भी और निचले स्तर की न्याय पालिका भी। नेता तो नग्न खड़े दिख ही रहे हैं। अब निष्पक्ष और सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में जांच जरूरी हो गई है।

कानपुर के एसएसपी रहे आईपीएस अनंत देव तिवारी की भूमिका भी जांच के दायरे में है। शहीद डीएसपी ने पहले ही तिवारी को पत्र लिखकर थानेदार और अपराधी की मिलीभगत का पत्र लिखा था; वो पत्र शहीद की बेटी ने उपलब्ध कराया वरना रिकार्ड से पत्र ही गायब है। तिवारी को कुछ दिन पहले एसटीएफ में भेज दिया गया था; आरोप लगने और अपराधी के सहयोगी के साथ फोटो वायरल होने पर फिलहाल तिवारी को हटाया जा चुका है।

सत्ता और विपक्ष के नेताओं संग कुख्यात विकास दुबे के फोटो वायरल हैं। दोनो पक्ष एक दूसरे पर अपराधियों को संरक्षण का आरोप लगा रहे हैं। एक मंत्री के साथ फोटो दिखने पर पूर्व मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ को घेरा तो उतर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ब्रजलाल मैदान में आ गए और अखिलेश यादव को निशाने पर लेते हुए कहा कि मुख्यमन्त्री रहते हुए अखिलेश ने आतंकियों की मदद में पुलिस पर ही एफआईआर करवा दी थी।

इन आरोप प्रत्यारोप के बीच यह बात जाहिर है कि डीएसपी की टीम को घेरकर मार दिया जाना पुलिस और नेताओं के गठजोड़ का परिणाम है। सिपाहियों की हत्या के बाद पुलिस ने कानपुर में विकास के घर बुलडोजर चलाकर अपनी धमक दिखाई मगर यह अपराध के खिलाफ असली उपचार नहीं है। जरा देखिये कि विकास कुछ नेताओं और पुलिस के संरक्षण में कैसे फल- फूला था। विकास दुबे ने इसी इलाके में शिवली थाने के अंदर दिन में ही राज्यमंत्री संतोष शुक्ल को गोलियों से भून डाला था। मुठभेड़ का दावा करती रहने वाली यूपी पुलिस के इस थाने में मंत्री की हत्या हो गई और पुलिस ने अपराधी पर एक गोली भी न चलाई और बाद में कोर्ट के सामने विकास को पहचानने से मुकर गई। पुलिस की मंशा आप समझ सकते हैं।

इस अपराधी पर दो दशक में 60 से ज्यादा हत्या, हत्या के प्रयास, रङ्गदारी मांगने जैसे गम्भीर मामले दर्ज हुए। उसने करोड़ों का इम्पायर खड़ा कर लिया। खुद को जिला परिषद का मेंबर बनवा लिया। सपा, बसपा और भाजपा के नेताओं के साथ रहा। खुफिया तन्त्र सोता रहा। उसके अपराध को देखा न अर्थ तन्त्र के विस्तार को। नेता तो फोटो खिचाने में परहेज नहीं करते; पर कितने आईएएस, आईपीएस खुलेआम जनता के संग फोटो खिचाते फिरते हैं? विकास दुबे और उसके गुर्गे कैसे इनकी महफ़िलों की शान बने घूमते रहे।

अब जरूरी है कि विकास दुबे और कानपुर पुलिस के कनेक्शन जांचे जाएं। खासकर वहाँ तैनात रहे आईपीएस अफसरों और सभी नेताओं के नजायज ताल्लुक सामने आने चाहिए। यह बात हैरत में डालती है कि इतने कुख्यात अपराधी का नाम एसटीएफ की टॉप लिस्ट में नहीं था। फिर किस बात कि समीक्षा पुलिस के आला अफसर करते हैं?विकास कोई 25 साल से अपराध में लिप्त है। भाजपा के राजनाथ सिंह के मुख्यमन्त्री रहते हुए उसने थाने में मंत्री को मारा। 20 साल बाद योगी आदित्यनाथ की सरकार में उसने 8 पुलिस वालों को मारा। बसपा नेता मायावती की सरकार हो या सपा के मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव की सरकार; यह सबमें फला फ़ूला।

जैसे नेता दल बदलते रहे, यह भी पाला बदलता रहा। एक डीएसपी का टीम सहित घेरकर मार दिया जाना यूपी के लिए ऐतिहासिक और चेताने वाली घटना है। जम्मू कश्मीर, पंजाब, छत्तीसगढ़ जैसा आतंक, नक्सल प्रभावित इलाका नहीं है कानपुर, कारोबारी नगर है। उत्तर प्रदेश मेें इसके पहले प्रतापगढ़ और मथुरा में  डीएसपी मारे गए थे। तमाम हमले हुए हैं और भी पुलिस पर;  मगर ऐसा नहीं की पूरी टीम शहीद हो गई हो।

बेईमान नेता, लालची पुलिस अफसरों और दुर्दांत अपराधियों का यह निकृष्ट गठजोड़ न्याय पालिक की नजर में भी है; और जनता की भी। उसके बाद भी इसे तोड़ा नहीं जा सका। पुलिस जब जो चाहती है कर लेती है; और जो न चाहे उसके खिलाफ लोग नेता और कोर्ट के चक्कर काटते हैं। इसलिए पुलिस सुधार जरूरी है।

आठ पुलिस अफसरों की शहादत का मसला हो या तमिलनाडु में पुलिस हिरासत में फुटपाथ के कारोबारी बाप-बेटे की बर्बर हत्या का मामला। पुलिस ने बाप-बेटे को मलद्वार में डण्डा घुसेड़कर मार डाला। वहाँ की पुलिस के खिलाफ पूरे देश में रोष फैला। दूसरे प्रदेशों की पुलिस भी कोई मित्र नजर नहीं आती; उसके बाद भी यही आम जन पुलिस की शहादत पर दुःखी होते हैं; उसे सलाम करते हैं। क्या तब भी पुलिस का मन निर्मल नहीं होता, कोई संवेदना नहीं जागती वर्दी के मान सम्मान में??

यह वारदातें पुलिस व्यवस्था में सुधार की मांग करती हैं। साथ ही देश की अपराधिक न्यायिक प्रक्रिया में तत्काल प्रभावी सुधार का संदेश देती हैं। हम आजादी के 72 साल बाद भी अंग्रेजों के पुलिस एक्ट से ही संचालित हैं।

इस बात पर मंथन करना होगा कि मंत्री को थाने में मार डालने वाला अपराधी फांसी के फंदे तक क्यों नहीं पहुंचा?  कैसे उसने अपना आतंक और हौसला इतना बढ़ा लिया कि पूरी पुलिस टीम को मार डाला।

विकास सिर्फ एक नजीर है। हर अपराधी को कानून में तय सजा मिलनी चाहिए। पुलिस की विवेचना, उसके तौर तरीकों और जिला स्तर के न्यायालयों की भूमिका की जांच जरूरी हो गई है।

पुलिस की जांच किसी एक घटना पर केंद्रित होकर रह जाती है और अपराधी के गैंग पर जोरदार प्रहार नहीं होता। शायद तभी अतीक अहमद जैसे माफ़िया जेल के अंदर से अपना गैंग चलाते हैं और रंगदारी के लिए कारोबारी को जेल के अंदर बुलवाकर पीटते हैं। अपराधियों का मनोबल तोड़ना, आर्थिक तन्त्र तोड़ना उनका घर तोड़ने से ज्यादा जरूरी है। गुंडों के खिलाफ विवेचना कमजोर होना, गवाह का मुकर जाना क्यों आम हो गया है? दुर्दांत अपराधी निचली अदालतों से उसी दिन क्यों बरी हुए जब जज रिटायर होने वाले थे? यह सब सच सामने आना आवश्यक है।

पुलिस सुधार के लिए समय-समय पर की गई सिफारिशों को लागू करके पुलिस को और प्रोफेशनल बनाने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इससे पुलिस आजाद और जवाबदेह होकर काम कर पायेगी। यानी अभियोजन दाखिल करने वाली विंग अलग हो और विवेचना करने वाली दूसरी। जाँच वैज्ञानिक तरीके से हो। पुलिस के अफसर भी रडार पर हों। चुनाव सुधार लागू करके राजनीतक दलों को भी सुधारने की जरूरत है। जनता के सामने बेहतर चुनने की आजादी मिले तो अपवादों को छोड़कर राजनीति से अपराधी दूर किये जा सकते हैं।

एक रिपोर्ट बताती है कि लोक सभा के साथ विधानसभाओ में अपराधी घुस आये हैं। एसोशिएसन फॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ार्म की 2017 के चुनावों की एक रिपोर्ट के मुताबिक यूपी की विधानसभा में 36 फीसदी विधायकों यानी 143 न कोई मामला दर्ज है; इसमें 107 पर हत्या जैसे गम्भीर अपराध दर्ज हैं। यह सीन बिना राजनीतिक सुधार के नहीं बदलेगा और न पुलिस गुंडा गठजोड़ टूटेगा। पुलिस अपने हित वाले गुंडों को पालेगी, जिसे चाहेगी उसका इनकाउंटर करेगी और निर्दोष लोगों को हिरासत में लेकर ठोक देगी। हर घटना के बाद शोर होगा और फिर खामोशी। कितने लोग जान पाते हैं पुलिस का सच? इस रिपोर्ट को देखिये और सोचिये।

‘नेशनल कैंपेन अगेन्स्ट टार्चर’ की ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में 865 लोग अलग-अलग प्रदेशों में पुलिस की हिरासत में मार दिया गए। इसमें 80 फीसदी आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर और वन्चित लोग थे। जैसे; तमिलनाडु में मारे गए बाप बेटे फुटपाथ पर रेहडी लगाते थे। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आकड़े बताते हैं कि यूपी में 2018 में 4 लाख 14 हजार 112 व्यक्ति भारतीय दण्ड संहिता के तहत विभिन्न अपराधों में पकड़े गए। इनमें सिर्फ 34 फीसदी को सजा हो पाई। शेष छूट गये। जो छूट गए उनमें कुछ निर्दोष भी फंसाये गए होंगे, कुछ की विवेचना में ढील रही होगी और कुछ गवाह मुकर गए होंगे।

यूपी की अदालतों में करीब 10 लाख 50 हजार मामले लम्बित हैं। इसके लिए न्याय की रफ्तार भी बढ़ानी होगी। कोई भी अपराधी बच न पाए उसे समय पर सजा मिले। ऐसा तन्त्र विकसित करना जरूरी है। रामराज्य का स्वप्न देखने वाले यूपी के सन्यासी मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ के सामने एक मौका है जिसे लपककर उन्हें पुलिस सुधार की पहल करनी चाहिए। अगर उन्होंने ऐसी राजनीतिक हिम्मत दिखाई तो न सिर्फ यूपी पुलिस चमक सकती है बल्कि इन सुधारों की बुनियाद पर राजनीतिक सुधार की इमारत खड़ी की जा सकती है।

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