Delhi Riots: दिल्ली हिंसा को एक साल हो गए लेकिन अभी तक असल मुजरिम आजाद घूम रहे हैं

इशरत खान

दिल्ली हिंसा को एक साल हो गया लेकिन अभी तक असल मुजरिम आजाद घूम रहे हैं, वही दिल्ली पुलिस मुस्लिम नौजवानों को दिल्ली हिंसा का आरोपी बना कर फर्जी मुकदमें में फंसा रही है जो खुद दिल्ली हिंसा की दोषी है दिल्ली दंगों के दौरान पुलिस ने कई मौकों पर कोई कार्रवाई नहीं की तो कहीं दंगाइयों की मदद किया और कहीं कहीं पर तो सीधे तौर पर हिंसा में शामिल रही उन दोषी पुलिस वालों पर आजतक कोई कार्यवाही नहीं हुई, दिल्ली सरकार के 1 लाख 14 हजार कैमरे का भी कुछ अता पता नहीं जिसके जरिये दोषियों को सीसीटीवी फुटेज की मदद से आसानी से पकड़ा जा सकता था, गृहमंत्री की पुलिस भी दोषी है लेकिन कोई कार्यवाही ना हुई है और ना होगी,
इतिहास गवाह है कि जब जब मुसलमान हक की आवाज बुलंद करता है सबसे ज्यादा मिर्ची संघ को लगती है, खैर
दिल्ली हिंसा में कपिल मिश्रा सीधे तौर पर दोषी है,
23 फरवरी को उनके भड़काऊ भाषण के तुरंत बाद ही हिंसा शुरू हो गई हालांकि कि उस वक्त कपिल मिश्रा के बयान और जाफराबाद में बढ़ती भीड़ से डिप्टी कमिश्नर वेद प्रकाश सूर्य भलीभाँति वाकिफ थे कि हिंसा किसी भी वक्त भड़क सकता है अगर चाहते तो जाफराबाद में इकट्ठा हुई द़गाई भीड़ पर सख्त कार्यवाही करके हिंसा रोकी जा सकती थी, लेकिन उनकी खामोशी उनकी बेबसी बता रही थी कि दंगाइयों पर कार्यवाही ना करने का ऊपर से कितना दबाव रहा होगा, अगर पुलिस चाहती तो हिंसा पर एक घंटे में काबू पा सकती थी लेकिन जानबूझ कर हिंसा को बढ़ावा दिया गया तीन दिन तक दिल्ली सुलगती रही किसी ने कुछ नहीं किया, और वही हुआ जिसका सभी को अंदेशा था हिंसा शांत होने के बाद मुस्लिमों के धर पकड़ का खेल शुरू हो गया, जो हुआ अचानक नहीं हुआ हिंसा की पटकथा पहले से लिखी जा चुकी थी बस अमल करना बाकी था, ऐसे में हमें जब यह विश्वास दिलाया जाता है कि कानून सबके लिए बराबर है तो अंदर कुछ टूट फूट जाता है

(ये लेखिका के अपने विचार हैं संस्था का इससे कोई लेना देना नहीं )

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