Election 2022: जानिए वोट डालना हमारा अधिकार ही नहीं कर्तव्‍य भी है

उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों में 10 फरवरी को पहले चरण के लिए मतदान हो चुका है। कुल सात चरणों में होने वाले इन चुनावों का परिणाम 10 मार्च को सामने आएगा। जाहिर है कि मतदान का हर चरण न सिर्फ महत्‍वपूर्ण है बल्‍कि निर्णायक भी है।

ऐसे में यह जानना बहुत जरूरी हो जाता है कि वोट डालना देश के प्रत्‍येक जिम्‍मेदार नागरिक का अधिकार तो है ही, साथ ही एक बड़ा कर्तव्‍य भी है। हालांकि बहुत से लोग इस कर्तव्‍यबोध से अनजान हैं क्‍योंकि उन्‍हें लगता है कि ये एक ऐसा अधिकार मात्र है जिसे इस्‍तेमाल करना या न करना उनकी इच्‍छा पर निर्भर करता है।

भारत में भले ही मतदान न करने पर फिलहाल किसी प्रकार की कार्रवाई का प्रावधान नहीं है लेकिन इसके लिए आवाज उठने लगी है कि मतदान हर नागरिक के लिए आवश्‍यक किया जाए। दुनिया के तमामा देशों में इसके लिए अलग-अलग नियम बने भी हैं। इन देशों में मतदान न करने पर जुर्माने से लेकर सजा तक का नियम निर्धारित है।

इन देशों में है मतदान अनिवार्य
उदाहरण के लिए ऑस्ट्रेलिया, बेल्जियम, स्विट्जरलैंड, अर्जेंटीना, सिंगापुर, साइप्रस, पेरू, बोलीविया समेत 33 देश ऐसे हैं जहां मतदान अनिवार्य है। इन देशों में से 19 ऐसे हैं जहां मतदान न करने पर सजा का नियम है।
ऑस्ट्रेलिया ऐसा देश है जहां मतदान करना हर नागरिक के लिए अनिवार्य है। कानून के तहत ऑस्ट्रेलिया के 18 वर्ष या इससे ऊपर आयु वाले हर व्यक्ति को मतदान करना अनिवार्य है, फिर चाहे व्यक्ति दुनिया के किसी भी कोने में क्यों न हो।

यहां यदि कोई व्यक्ति मतदान नहीं करता है तो उस पर जुर्माना लगाया जाता है, भले ही उसके वोट न कर पाने की कुछ भी वजह क्यों न हो। यदि व्यक्ति जुर्माने का भुगतान नहीं करता है तो मामला अदालत में जाता है। वहां व्यक्ति को जुर्माने के साथ अदालती खर्च का भी भुगतान करना पड़ता है।

बेल्जियम में तो मतदान न करने पर 1893 से ही जुर्माना लगाने का नियम है। ब्राजील में मतदान न करने पर पासपोर्ट जब्त कर लिया जाता है। सिंगापुर में अगर कोई नागरिक मतदान नहीं करता है तो उससे मत अधिकार ही छीन लिया जाता है। बोलीविया में यदि कोई व्यक्ति मतदान नहीं करता है तो उसे तीन महीने का वेतन वापस देना पड़ता है।

ब्रिटेन में यदि मतदाता किसी कारण से मतदान के समय अनुपस्थित होता है तो उसे इस बात की पहले से जानकारी देनी पड़ती है। इसके बाद वह अन्य स्थान से भी अपने मत का प्रयोग कर सकता है।

इनके अलावा न्यूजीलैंड एक ऐसा देश है जहां मतदान के लिए उपस्थित न हो पाने की सूरत में चुनाव आयोग की टीम घर तक जाती है और फिर डाक के माध्यम से मतदान कराया जाता है।

भारत में अभी ऐसा कोई नियम नहीं
खैर, भारत में चूंकि अभी ऐसा कोई नियम नहीं है इसलिए हर व्‍यक्‍ति मतदान करने या न करने के लिए स्‍वतंत्र है। वह वोट डालने को अपना अधिकार तो मानता है किंतु कर्तव्‍य मानने के लिए तैयार नहीं है। यही कारण है कि तमाम प्रयासों के बावजूद यहां औसत 60 प्रतिशत तक ही मतदान हो पाता है।

आश्‍चर्य की बात यह है कि देश के भाग्‍य विधाताओं का चुनाव करने में उदासीन रहने वाला ये तबका बड़े-बड़े बदलावों की अपेक्षा तो रखता है और कहता है नेताओं ने देश को बर्बाद कर दिया किंतु यह कभी नहीं सोचता कि हर स्‍थिति व परिस्‍थिति के लिए उसकी उदासीन सोच भी काफी हद तक जिम्‍मेदार है क्‍योंकि उसे अपने कर्तव्‍यों का बोध नहीं है, सिर्फ अधिकारों की चिंता है।
बहरहाल, यदि देश को अपेक्षाओं के अनुरूप बनाना है और निर्वाचन होते ही नेताओं को आमजन का भाग्‍य विधाता समझने की फितरत से उबारना है तो अधिकारों का सही इस्तेमाल करते हुए कर्तव्‍यों का भी पूरा निर्वहन करना होगा अन्‍यथा चुनाव दर चुनाव स्‍थितियां बद से बदतर होती जाएंगी।

विशेष तौर पर वर्तमान चुनावी प्रक्रिया के मामले में, जहां अनेक पार्टियों एवं अनेक प्रत्‍याशियों के होते हुए विकल्‍पहीनता ने मतदाता को लगभग असहाय बना रखा है। उसे थोपे हुए प्रत्‍याशियों में से ही किसी का चुनाव करना है क्‍योंकि प्रत्‍याशियों के चयन में उसकी कोई भूमिका नहीं है।

अब सवाल यह उठता है कि प्रत्‍याशियों के चयन में आमजन की सीधी भागीदारी होगी तो कैसे होगी?
यही वो सवाल है जिसका जवाब आपको आपके कतर्व्‍य बोध से मिल सकता है। जैसे कि यदि आप यह ठान लें कि जनप्रतिनिधि का चुनाव जाति, धर्म और मजहब से ऊपर उठकर करना है तो संभवत: राजनीतिक दल भी आपकी अपेक्षानुसार प्रत्‍याशी पेश करने पर बाध्‍य होंगे।
दलगत राजनीति की मानसिकता को त्यागकर राष्‍ट्रहित को सर्वोपरि मानते हुए यदि हम मतदान करेंगे तो बहुत सी समस्‍याओं का समाधान स्‍वत: हो जाएगा। कहीं से तो शुरूआत करनी होगी, ये विचार रखकर चुनावों के बाद भी अच्‍छे लोगों को राजनीति में लाने की मुहिम और बुरे लोगों को एक्‍सपोज करने का काम लगातार करना होगा क्‍योंकि तभी कोई सार्थक परिणाम मिलेंगे अन्‍यथा चुनाव हमेशा पांच साला त्‍यौहार से अधिक साबित नहीं हो पाएंगे।

वर्तमान वैश्‍विक चुनौतियों के चक्रव्‍यूह में घिरे देश को जितनी आवश्‍यकता स्‍वस्‍थ लोकतंत्र की है, उससे अधिक केंद्र ही नहीं राज्‍यों में भी ईमानदार नेतृत्‍व की है। अच्‍छा नेतृत्व ही निजी स्‍वार्थों की तिलांजलि देकर जनहित व राष्‍ट्रहित की बात सोच सकता है।
बेशक कोई भी व्‍यवस्‍था ऐसी नहीं होती जिसमें कोई खामी न हो परंतु ऐसी व्‍यवस्‍था जरूर हो सकती है जिसमें कम से कम खामियों हों। खामियां जितनी कम होंगी, चुनौतियां खुद ब खुद उतनी छोटी रह जाएंगी।
तय समझिए कि हर काम सरकार के जिम्‍मे डाल देने वाला समाज कभी अपने कर्तव्‍य के प्रति ईमानदार नहीं हो सकता, और जो समाज कर्तव्य के प्रति ईमानदार नहीं है उसे अधिकारों की बात करने का कोई हक नहीं रह जाता। उसे हमेशा पशुओं की तरह हांका जाता रहेगा। कभी घोषणापत्रों के नाम से सस्‍ता ”चुनावी चारा” दिखाकर तो कभी ”खास जाति व धर्म” का भय दिखाकर।

बेहतर होगा कि समय रहते पशुवत आचरणों का त्‍याग कर बुद्धि और विवेक का इस्‍तेमाल करना शुरू करें ताकि आने वाली पीढ़ी से फक्र के साथ यह कह सकें कि राष्‍ट्र के निर्माण में सिर्फ नेताओं की ही नहीं, आपकी भी कोई भूमिका है।
-सुरेन्‍द्र चतुर्वेदी
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